Quotes on Jainism
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मोक्षमार्ग के सेवक को संस्थाओं के झंझंट में कभी नहीं पङना चाहिये, क्योंकि लोग जुदे जुदे ख्याल के होते हैं, अपने अभिप्राय के अनुकूल कार्य का होना अत्यन्त कठिन है।
यदि शान्ति चाहते हो तब किसी कार्य में मुखिया मत बनो, कोई कार्य उचित जचता हो तो उसे बतलाकर अरत बने रहो, इसमें कुछ कपट भी नहीं क्योंकि तुमने शान्ति के लिये नैष्ठिक श्रावक का व्रत लिया है। from Atma Sambodhan by Sahajanand Varni Ji | एक नदी मुझसे मिलने सुना है, सारे रास्ते दौड़ती हाँफती आयी है
पर मेरे समीप आकर, मुझमें समाने से पहिले देख रहा हूँ वह, एकदम शान्त हो गयी है उसे देखकर ज़रा भी तो नहीं लगता कि थकी हारी मुसीबतों को पार करती हुई आयी होगी सोच रहा हूँ कि क्या अपने में समाने से पहिले, हम इतने ही शान्त हो जायेंगे ? Munishri KshamaSagar Ji |
हीनता का भाव भी अहंकार पैदा करता है । दूसरे के सम्मान में अपना अपमान मानना भी अहंकार है ।
मुनिश्री क्षमासागर जी
स्वतन्त्रता में ही सुख है पर के सम्बन्ध से जीव कभी भी सुखी नहीं हो सकता, क्योंकि जहां पर पराधीनता है, वही दुःख है। स्वतन्त्रता ही सुख की जननी है, सुख का साधन एकाकी होना है।
मेरी जीवन गाथा: भाग २, पृ० ४१ - Autobiography of Pujya Ganesh Varni Ji
मुनिश्री क्षमासागर जी
स्वतन्त्रता में ही सुख है पर के सम्बन्ध से जीव कभी भी सुखी नहीं हो सकता, क्योंकि जहां पर पराधीनता है, वही दुःख है। स्वतन्त्रता ही सुख की जननी है, सुख का साधन एकाकी होना है।
मेरी जीवन गाथा: भाग २, पृ० ४१ - Autobiography of Pujya Ganesh Varni Ji
"संसार में मनुष्यॊ की प्रवृत्ति स्वेच्छानुसार होती है और वे अन्य को अपने रूप परिणमाना चाहते हैं जब कि वे परिणमते नहीं। इस दशा में महा दुःख के पात्र होते हैं। मनुष्य यदि यह मानना छोङ देवे कि पदार्थ का परिणमन हम अपने अनुकूल कर सकते हैं तो दुःखी होने की कुछ भी बात ना रहे।"
मेरी जीवन गाथा: भाग २, पृ० १ - Autobiography of Pujya Ganesh Varni Ji






















